100% orignal 1534-1581 || guru ramdas ji history in punjabi & hindi

guru ramdas ji history in punjabi

guru ramdas ji history in punjabi

guru ramdas ji

“guru ramdas ji महाराज guru nanak dev ji” की चौथे स्वरुप जा कहलो पांचवे नानक थे।।
त्याग की मूरत ,निम्रता के पुंजः निमानयो के मान सतगुरु इलाही जोत महाराज जी के सम्पूर्ण जीवन आप को संक्षेप में बताने का प्रयतन करेंगे।।guru ramdas ji history in punjabi

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जन्म ,वंशज और बचपन

संन 1531 इ : लहौर की चूना मंडी में आप के पहले बज़ुर्ग गुरदयाल सोढ़ी जी आए। उनके दो पुत्र थे दूसरे का नाम ठाकुर दास और guru ramdas ji history in punjabiउनकी पत्नी का नाम कर्मो था। मैकलफ बीबी जी का नाम जसवंती लिखते है। ठाकुर दास जी के घर 1500 ई: हरिदास जी का जन्म हुआ। उनकी पत्नी का नाम बीबी दया कोर था। शादी के 12 साल बाद इस दंपति के घर 25 सतंबर 1534 ई: को guru ramdas ji का प्रकाश हुआ। घर में सबसे बड़े होने के कारण आप जी का नाम जेठा रखा गया। फिर 2 साल बाद guru ramdas ji के भाई हरिदयाल जी का जन्म हुआ और उनके बाद आप जी की बहन रामदासी जी का जन्म हुआ।
आप जी की झलक मोहित करने वाली थी। हर समय खुश रहना आप के स्भाव में था। अभी 7 साल का समय गुज़रा था की आप के माता पिता जी का स्वर्गवास हो गया। छोटे भाई बहन के जिमेवारी आप के सिर आन पड़ी। आप जी ने रावी नदी के किनारे घुंघणीआं वेचना शुरु कर दी। जिमेवारी बहुत बड़ी थी। बचपन के घर को छोड़ना और पिता जी की दुकान को ताला लगा देख दिल को खींच सी पड़ती। 1541 ई: को आपकी नानी आप जी को बासरके नानके घर ले आए। छोटी सी आयु में ही आप ने दर दर की ठोकरे खाई।

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बासरके नानके घर में आप जी 10 साल तक रहे। guru amar das जी वह भी बासरके के रहने वाले थे। guru amar das जी उन दिनों दूसरे नानक guru angad dev ji के हो गए और वह खंडूर साहिब ही रहने लगे। guru ramdas ji का मिलाप guru amar das जी के साथ नानके घर आने के समय ही हो गया था। नानके घर आने के बाद आप जी अपने नानी और छोटे बहन भाई की जिमेवारी उठा गांव के बाहर एक तलाब के किनारे घुँघनीआ बेच गुज़र बसर करने लगे।

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शादी और गोइंदवाल में 22 साल

guru amar das जी महाराज guru nanak dev ji के जोति स्वरूप होने के बाद जब बासरके आए तो सभी गाँव वाले बहुत खुश हुए। guru amar das जी जब गोइंदवाल साहिब परिवार को साथ लेकर चले उस समय भाई जेठा जी (guru ramdas ji) ने भी साथ जाने का मन बना लिया। उस समय आप जी की आयु 16 साल की हो गई थी। गोइंदवाल में आकर आप जी ने अपने जीवन में बहुत संघर्ष guru ramdas ji history in punjabiकिया। अपने परिवार को पालने के लिए दोनों हाथो से ईमानदारी से काम करते। बचे समय में guru nanak dev ji महाराज के दर पर सेवा करते।
guru amar das जी आप जी की सेवा से बहुत खुश थे। दसंबर 1552 ई: की बात है। एक दिन बीबी मनसा देवी जी ने guru amar das जी से बीबी भानी जी के लिए वर की तलाश करने को कहा। उस समय guru amar das जी ने बीबी जी से पूछा कि आप जी को कैसा वर अच्छा लगता है। बीबी जी बोले भाई जेठे (guru ramdas ji) जैसा। guru amar das जी बोले जेठे जैसा तो फिर जेठा ही है। भाई जेठा जी से इस बारे में बात की गई और आप जी ने बहुत निम्रता से विनती परवान की। बीबी भानी जी से आप की शादी दसंबर 1552 ई: में हो गई।

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निम्रता की मूर्ति भाई जेठा (guru ramdas ji) जी को जब उनके सके संबंधी मिलने आए तो आप जी के सिर पर टोकरी देख बोले की तुमने हमारी कुल की बदनामी करवा दी। तुझे ससुर के जहाँ टोकरी उठाना अच्छा नहीं लगता। भाई जेठा जी उनको बोले गुरु घर में निमाणे होकर मन को टिकाव मिलता है। guru amar das महाराज जी को जब उन्होंने बोला तो वह बोले मुझे यह टोकरी नहीं निरंजनी शतर दिखाई दे रहा है जो भाई जेठा जी(guru ramdas ji) के ऊपर झूलना है। भाई जेठा (guru ramdas ji )जी ने भी ससुर जवाई के रिश्ते से ऊपर उठ 24 साल सेवा की। सेवा भी ऐसी कि 6 साल तक guru amar das के दिए हुए सिरपाओ को सजा कर रखा। बेपरवाह इतने के एक बार सुच्चे मोतिओं की माला उस मंगते को दे दी जो गुरु घर के सामने बैठ हर वक्त जोर जोर से शोर मचाता था। आप जी ने सोचा खबरे शांत हो जाए। आप जी के तीन बेटे हुए। सबसे बड़े तेज सुभाओ के मालिक प्रिथी चंद, बीच के मस्त स्भाव महादेव जी और सब से छोटे थे निम्रता की मूर्त guru arjan dev ji जी।

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लहोर में अकबर से मुलाकात

फरवरी 1566 ई: को अकबर अपने सौतेले भाई मिर्ज़ा हाकम के पंजाब हमले की इतलाह पाकर खुद लहोर आया। अकबर के लहौर आने की खबर सुन मिर्ज़ा हाकम वापस चला गया लेकिन अकबर खुद वहां 1 साल तक रुका रहा। अकबर जब मार्च 1566 ई: को वापस आने लगा तो सनातनी पंडितो ने महिजर नामा लिख अकबर को दिया। उसमे लिखा था की guru amar das सभी जाति धर्मो को एक कर रहा है। बिना किसी जात पात देखे लंगर लगा एक नया धर्म बनाता जा रहा है।

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अकबर ने guru amar das जी से इसका जवाब माँगा। उस वक्त guru amar das जी ने guru ramdas ji को इस बात के योग समझ अकबर का शक दूर करने के लिए भेजा। आप जी ने लहौर जाकर अपना ठिकाना चूना मंडी में किया। आप जी को बहुत अदब से लिजाया गया। जाते ही आप पर सवालों की बरसात होने लगी। सुच,भिट्ट,गायत्री मंत्र का जाप न करना, लंगर लगाने जिसके मुँह में जो आया सो बोलता गया।guru ramdas ji history in punjabiआप सभी की सुनते रहे लेकिन जब आपने ik onkar मूलमंत्र से शुरु किया तो किसी कोई सवाल ना रहा। उल्टा आपके चेहरे की तरफ सभी देखने लगे। ik onkar मूलमंत्र से अकबर बहुत प्रभावित हुआ और guru amar das जी के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। अकबर 1567 ई: के शुरु में दिल्ली को वापस जाते समय गोइंदवाल आया। guru घर आकर अकबर ने पंगत में बैठ लंगर शका उसके बाद guru amar das जी के दर्शन किए। उस समय अकबर ने 12 गाओं के पटे लिख दिए और हरेक वर्ष 1 लाख 20 हजार शुकराने के तौर भेजता रहा। इतहास कहता है की 12 गाओं के पटे एक आले में पड़े रहे।

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गुर्त्ता गद्दी का मिलना

देखा जाए तो बहुत से अपना हक्क मानते थे गुरु गद्दी पर लेकिन जिनकी तरफ ज्यादा ध्यान जाता था संगत का वह थे भाई रामा जी और भाई जेठा जी (guru ramdas ji) guru amar das जी ने पर्ख के लिए भाई रामा जी को थड़ी बनाने को कहा जब थड़ी बनकर त्यार हो गई तो guru amar das जी बोले यह सही नहीं है इसको तोड़ दो। तोड़ने की बात सुन रामा जी इधर उधर की बाते करने लगे और कहने लगे जैसा आपने बोला था वैसी ही बनाई है ऊपर से आप को ही समझाने लग गए। guru amar das जी सब जानते थे। फिर वह भाई जेठा जी के पास आए और उनको भी बनी हुई थड़ी तोड़ने को कहा। बिना देरी किए भाई जेठा जी ने थड़ी को तोड़ दिया और भूल की माफ़ी मांगी। दूसरे दिन फिर वैसा ही हुआ। भाई रामा जी को दूसरी बार थड़ी को तोड़ने का बोलने पर वह भड़क गए।

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कहने लगे इससे अच्छी नहीं बनाई जा सकती। आपको ही पसंद नहीं आ रही बाकी सभी ने तो खूब सराहा। जब भाई जेठा जी (guru ramdas ji) के पास गए तो तोडना शब्द अभी पातशाह जी के मुख में ही था की आप ने थड़ी को तोडना शुरु कर दिया। दुबारा फिर पातशाह जी से मुआफी माँग बोले आप कृपा करके मुझे बताए मेरे में इतनी मत कहाँ।
तीसरे दिन फिर इस तरह हुआ। भाई रामा ने तो यह तक बोल दिया की आपकी उम्र हो गई है आपको कुछ याद नहीं रहता। इससे अच्छी थड़ी कोई नहीं बना सकता। दूसरी तरफ जब भाई जेठा जी(guru ramdas ji) के पास गए तो पातशाह अभी बोलने ही वाले थे की भाई जेठा जी ने फिर थड़ी को तोडना शुरु कर दिया। पातशाह की चरणों को पकड़ लिया बोले की आप ही कृपा करो। यह बातें सुन पातशाह बहुत खुश हुए और भाई जेठा जी(guru ramdas ji) को गुरता गददी के असली हकदार माना।

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guru ramdas ji history in punjabiसतंबर 1574 ई: की एक सुबह guru amar das जी जब नीचे उतर रहे थे उस समय बीबी भानी जी को देख बोले। बेटा अगर रामदास गुज़र जाए तो क्या करोगे। बीबी भानी जी ने अपने सुहाग की निशानी उतार guru amar das जी के चरणों में रख दी और परमात्मा का हुकम मानने का कहा। बेटी की इतनी निश्ठा देख guru amar das बहुत खुश हुए और अपनी आयु में से 6 साल 11 माह 18 दिन की आयु guru ramdas ji को दे दी। उसी समय guru amar das जी बाउली साहिब की तरफ गए guru ramdas ji के सिर से बाबा बुढ़ा जी को टोकरी उतारने की बिनती की। साफ कपड़े मंगवाए 3 पैसे और एक नारीयल रख कर आप शब्द की स्थापना की। बाउली साहिब के सामने दीवान लग गए। चारो तरफ आयु और गुरता गददी की खबर फैल गई। दातू और दासू जी भी आए। उस समय guru amar das जी ने जो शब्द बोले वह भाई गुरदास जी ने रामकली सद नाम देकर अपने पास लिख लिया। जो आज भी guru granth sahib में 923 अंग में दर्ज है। guru amar das जी ने चेहरे पर चादर ओढ़ ली। देखते ही देखते वह जोति जोत समा गए। guru ramdas ji ने 1574 ई: से 1581 ई: के गुरयाई के 7 साल के समय अंदर 30 रागो में बाणी रची। शब्द 246 , अष्टपदिआं 33 , शंत 28 , जो श्री guru granth sahib ji में अंकित है।

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अमृतसर और अंत का समय

guru amar das के जोति जोत समा जाने के बाद guru ramdas ji खमोश से सभी से दूर दूर रहने लगे।guru ramdas ji history in punjabi संगत ने बाबा बुढ़ा जी को साथ ले guru ramdas ji के सामने guru घर की मर्यादा को आगे बढ़ाने की बिनती की। आप जी ने बिनती परवान की। पहले से चल रही लंगर और पंगत की मर्यादा को और आगे तक लेकर गए। आप जी के दर्शनों के लिए चौरासी सिद्धो की मंडली आए। किंगरी वाले जोगीओ की मंडली भी आई। तपे के पखंड को तोडा। दूसरी तरफ गोइंदवाल की आबादी बहुत घनी होने लगी। वेयास नदी के किनारे होने के कारण शाही फौज का रास्ता बण चुका था। आने जाने वालो की आँखों में चुबने लगा तो पंथ के लगतार बढ़ते कद को देखकर राजधानी की कमी महसूस हुई। guru amar das जी ने जीवत रहते ही

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guru ramdas ji को वह स्थान का पता बताया जिस जगह अमृतसर की नीव रखी जानी थी। 1573 ई: के शुरु में तुंग गाओं के पूर्व गाओं सुल्तान के पश्चिम में साथ आती जमीन को सात सो रुपए अकबरी देकर जमीन खरीदी और amritsar का निर्माण करवाया। 1577 ई: में यह नगर चक रामदास का करकर बहुत लोकप्रिय हुआ।
जब अर्जन देव जी हर वक्त guru घर की सेवा में लीन रहते वहीं प्रिथी चंद हर समय चाल बाज़ी करते रहते और हर वक्त गुरु गददी पर guru ramdas ji history in punjabiअपना हक जताते। महादेव जी तो वैरागी स्भाव के थे वह किसी भी बात में नहीं पड़ते थे। भाई सहारी मल guru ramdas ji के चाचा के बेटे आप के बड़े भाई थे। वह लहौर रहते थे। उनके बेटे की शादी थे वह खुद चलकर बिनती करने आए। guru ramdas ji पहले प्रिथी चंद को शादी में जाने के लिए बोलै। वह आगे से पैसे के हिसाब की संभाल का बहाना बना मना करने लगा। महादेव से बोले तो उन्होंने ने उपदेश झाड़ना शुरु कर दिया। लेकिन जब guru arjan dev ji जी को कहा तो उन्होंने आपके हुकम को सर आँखों पर कहा। शादी खत्म हो चुकी थी। guru arjan dev ji जी समय निकाल संगत को गुरबाणी के साथ जोड़ते। जैसे जैसे समय गुज़र रहा था वैसे वैसे गुरु जी के दर्शन की प्यास बढ़ती जा रही थी।

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guru arjan dev ji जी ने 3 खत लिखे। जिनमे से 2 guru ramdas ji को नहीं मिले। प्रिथी चंद ने चलाकी से वह संभाल लिए। उनका जवाब अपनी तरफ से ही लिखता रहा। जब तीसरा खत guru ramdas ji को मिला तो सचाई का पता चला। उस समय guru ramdas ji ने बाबा बुढा जी को guru arjan dev ji जी को बुलाने की बिनती की। 28 अगस्त 1581 ई: को guru arjan dev ji को गुरु गददी देकर गुरबाणी का पसार करने का उपदेश दिया। 1 सतंबर 1581 ई: को अमृतवेले हर रोज़ की तरह नितनेम कर संगत से आज्ञा मांगी। 6 साल 11 माह 18 दिन की आयु पूरी कर आप जोति जोत समा गए।

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“guru ramdas ji”

“guru ramdas ji ਮਹਾਰਾਜ guru nanak dev ji” ਦੀ ਚੋਥੀ ਜੋਤ ਜਾਂ ਕਹਿ ਲਵੋ ਪੰਜਵੇ ਨਾਨਕ ਸਨ। ਤਿਆਗ ਦੀ ਮੂਰਤ ,ਨਿਮਰਤਾ ਦੇ ਪੁੰਝ ਨਿਮਾਣਿਆ ਦੇ ਮਾਣ ਸਤਿਗੁਰੂ ਇਲਾਹੀ ਜੋਤ ਮਹਾਰਾਜ ਜੀ ਦੇ ਜੀਵਨ ਬਾਰੇ ਸੰਖੇਪ ਚ ਆਪ ਜੀ ਨਾਲ ਜਾਣਕਾਰੀ ਸਾਂਝੀ ਕਰਨ ਦਾ ਯਤਨ ਕਰਾਂਗੇ।

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ਜਨਮ,ਵੰਸ਼ ਅਤੇ ਬਚਪਨ

ਸੰਨ 1531 ਈ : ਲਹੌਰ ਦੀ ਚੂਨਾ ਮੰਡੀ ਚ ਆਪ ਦੇ ਪਹਿਲੇ ਬਜ਼ੁਰਗ ਗੁਰਦਿਆਲ ਸੋਢੀ ਜੀ ਆਏ। ਓਨਾ ਦੇ ਦੋ ਪੁੱਤਰ ਸਨ ਦੂਜੇ ਦਾ ਨਾਮ ਠਾਕੁਰ ਦਾਸ ਤੇ ਓਨਾ ਦੀ ਪਤਨੀ ਕਰਮੋ ਸੀ। ਮੈਕਾਲਫ ਬੀਬੀ ਜੀ ਦਾ ਨਾਮ ਜਸਵੰਤੀ ਲਿਖਦੇ ਨੇ। guru ramdas ji history in punjabiਠਾਕੁਰ ਦਾਸ ਜੀ ਦੇ ਘਰ ਸੰਨ 1500 ਈ; ਨੂੰ ਹਰਿਦਾਸ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ ਹੋਇਆ ਤੇ ਓਨਾ ਦੇ ਪਤਨੀ ਦਾ ਨਾਮ ਬੀਬੀ ਦਯਾ ਕੌਰ ਸੀ। ਸ਼ਾਦੀ ਤੋਂ 12 ਸਾਲ ਬਾਅਦ ਇਸ ਜੋੜੇ ਦੇ ਘਰ 25 ਸਤੰਬਰ 1534 ਈ: ਨੂੰ guru ramdas ji ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਹੋਇਆ।ਘਰ ਚ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਆਪ ਜੀ ਦਾ ਨਾਮ ਜੇਠਾ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ। ਫਿਰ 2 ਸਾਲ ਬਾਅਦ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਭਾਈ ਹਰਦਿਆਲ ਦਾ ਜਨਮ ਹੋਇਆ ਤੇ ਓਨਾ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਭੈਣ ਰਾਮਦਾਸੀ ਜੀ ਦਾ ਜਨਮ ਹੋਇਆ।   guru ramdas ji history in punjabi

                        ਆਪ ਜੀ ਦੀ ਦਿੱਖ ਬਹੁਤ ਖਿੱਚਵੀਂ ਸੀ। ਸਦਾ ਹੱਸਦੇ ਰਹਿਣਾ ਆਪ ਜੀ ਦਾ ਸਹਿਜ ਸੁਭਾਓ ਸੀ। ਹਜੇ 7 ਸਾਲ ਦਾ ਸਮਾਂ ਹੀ ਬੀਤਿਆ ਸੀ ਕੇ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਮਾਤਾ ਪਿਤਾ ਜੀ ਦਾ ਸਵਰਗਵਾਸ ਹੋ ਗਿਆ। ਛੋਟੇ ਭਰਾ ਅਤੇ ਭੈਣ ਦੀ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਆਣ ਪਈ। ਆਪ ਜੀ ਨੇ ਰਾਵੀ ਦੇ ਕੰਢੇ ਤੇ ਘੁੰਗਣੀਆਂ ਵੇਚਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਜਿੰਮੇਵਾਰੀ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਸੀ। ਬਚਪਨ ਦੇ ਘਰ ਨੂੰ ਸ਼ੱਡਣਾ ਤੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਦੀ ਹੱਟ ਨੂੰ ਜਿੰਦਰਾ ਲੱਗਾ ਦੇਖਣਾ ਦਿਲ ਨੂੰ ਧੂ ਪਾਉਂਦਾ ਸੀ। 1541 ਈ: ਨੂੰ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਨਾਨੀ ਜੀ ਆਪ ਜੀ ਨੂੰ ਬਾਸਰਕੇ ਨਾਨਕੇ ਘਰ ਲੈ ਆਏ। ਛੋਟੀ ਜਿਹੀ ਉਮਰ ਚ ਹੀ ਦਰ ਦਰ ਦੀਆ ਠੋਕਰਾਂ ਖਾਦੀਆ ਆਪ ਜੀ ਨੇ।

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ਬਾਸਰਕੇ ਨਾਨਕੇ ਘਰ ਆਪ ਜੀ 10 ਸਾਲ ਤੱਕ ਰਹੇ। guru amar das ਜੀ ਵੀ ਬਾਸਰਕੇ ਦੇ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਸਨ। guru amar das ਉਸ ਸਮੇ ਦੂਸਰੇ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ guru angad dev ji ਦੇ ਹੋ ਕੇ ਰਹਿ ਗਏ ਤੇ ਖਡੂਰ ਸਾਹਿਬ ਰਹਿਣ ਦਾ ਮਨ ਬਣਾ ਲਿਆ। guru ramdas ji ਦਾ ਮੇਲ guru amar das ਜੀ ਨਾਲ ਨਾਨਕੇ ਪਿੰਡ ਆਉਣ ਸਮੇ ਹੀ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਆਪ ਜੀ ਆਪਣੇ ਨਾਨੀ ਅਤੇ ਛੋਟੇ ਭੈਣ ਭਰਾ ਦੀ ਜਿੰਮੇਵਾਰੀ ਚੁੱਕ ਤਲਾਬ ਕੰਡੇ ਘੁੰਗਣੀਆਂ ਵੇਚ ਕੇ ਗੁਜ਼ਾਰਾ ਕਰਨ ਲੱਗੇ।

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ਵਿਆਹ ਅਤੇ ਗੋਇੰਦਵਾਲ ਚ 22 ਸਾਲ

guru amar das ਮਹਾਰਾਜ guru nanak dev ji ਦੀ ਜੋਤ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜਦੋ ਬਾਸਰਕੇ ਆਏ ਤਾ ਸਾਰੇ ਪਿੰਡ ਨੇ ਬਹੁਤ ਖੁਸ਼ੀਆਂ ਮਨਾਈਆਂ। guru amar das ਜੀ ਜਦੋ ਗੋਇੰਦਵਾਲ ਸਾਹਿਬ ਲਈ ਪਰਿਵਾਰ ਲੈ ਕੇ ਚੱਲੇ ਤਾ ਉਸ ਵਖਤ ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ (guru ramdas ji) ਨੇ ਵੀ ਨਾਲ ਜਾਣ ਦਾ ਮੰਨ ਬਣਾ ਲਿਆ। ਉਸ ਸਮੇ ਆਪ ਈ ਦੀ ਉਮਰ 16 ਸਾਲ ਸੀ। ਗੋਇੰਦਵਾਲ ਆਣ ਆਪ ਜੀ ਨੇ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੀ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਘਾਲਣਾ guru ramdas ji history in punjabiਕੀਤੀ। ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰ ਨੂੰ ਪਾਲਣ ਲਈ ਦਸਾਂ ਨੋਹਾਂ ਦੀ ਕਿਰਤ ਕਰਦੇ ਤੇ ਬਾਕੀ ਸਮਾਂ guru nanak dev ji ਮਹਾਰਾਜ ਜੀ ਦੇ ਦਰ ਤੇ ਸੇਵਾ ਕਰਦੇ। guru amar das ਜੀ ਆਪ ਜੀ ਦੀ ਸੇਵਾ ਭਾਵਨਾ ਤੋਂ ਬਹੁਤ ਖੁਸ਼ ਸਨ। ਦਸੰਬਰ 1552 ਈ: ਦੀ ਗੱਲ ਹੈ। ਇਕ ਦਿਨ ਬੀਬੀ ਮਨਸਾ ਦੇਵੀ ਜੀ ਨੇ guru amar das ਜੀ ਅੱਗੇ ਬੀਬੀ ਭਾਨੀ ਜੀ ਲਈ ਵਰ ਲੱਭਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਤਾਂ ਉਸ ਸਮੇ guru amar das ਜੀ ਨੇ ਬੀਬੀ ਜੀ ਨੂੰ ਪੁੱਛਿਆ ਤੋਹਾਨੂੰ ਕਿਹਾ ਜਿਹਾ ਵਰ ਅੱਛਾ ਲਗਦਾ ਹੈ।

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ਬੀਬੀ ਜੀ ਬੋਲੇ ਭਾਈ ਜੇਠੇ (guru ramdas ji) ਵਰਗਾ। guru amar das ਜੀ ਬੋਲੇ ਜੇਠੇ ਵਰਗਾ ਤਾ ਫਿਰ ਜੇਠਾ ਹੀ ਹੈ ਜੀ। ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ ਨੂੰ ਪੁੱਛਿਆ ਗਿਆ ਤਾ ਓਨਾ ਬੜੇ ਨਿਮਰਤਾ ਸਹਿਤ ਬੇਨਤੀ ਪਰਵਾਨ ਕੀਤੀ। ਬੀਬੀ ਭਾਨੀ ਜੀ ਨਾਲ ਆਪ ਜੀ ਦਾ ਵੀਆਹ ਦਸੰਬਰ 1552 ਈ: ਨੂੰ ਹੋਇਆ। ਨਿਮਰਤਾ ਦੇ ਪੁੰਜ ਭਾਈ ਜੇਠਾ (guru ramdas ji) ਜੀ ਨੂੰ ਜਦੋ ਸ਼ਰੀਕ ਤੇ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰ ਮਿਲਣ ਆਏ ਤਾ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਟੋਕਰੀ ਚੁੱਕੀ ਦੇਖ ਬੋਲੇ ਕਿ ਤੋਂ ਸਾਡੀ ਕੁੱਲ ਦੀ ਬਦਨਾਮੀ ਕਰਵਾ ਰਿਹਾ ਏ। ਤੈਨੂੰ ਸੋਹਰੇ ਘਰ ਟੋਕਰੀ ਚੁੱਕਣੀ ਸੋਭਦੀ ਨਹੀਂ। ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ ਬੋਲੇ ਗੁਰੂ ਘਰ ਨਿਮਾਣੇ ਹੋ ਕੇ ਮਨ ਨੂੰ ਟਿਕਾ ਮਿਲਦਾ ਹੈ।

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guru amar das ਮਹਾਰਾਜ ਜੀ ਨੇ ਆਖਿਆ ਕਿ ਇਹ ਟੋਕਰੀ ਨਹੀਂ ਹੈ ਇਹ ਤਾਂ ਨਿਰੰਜਨੀ ਛਤਰ ਹੈ ਜੋ ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ ਉਪਰ ਝੂਲਣਾ ਹੈ। guru ramdas ji ਨੇ ਵੀ ਸੋਹਰੇ ਜਵਾਈ ਦੇ ਰਿਸ਼ਤੇ ਤੋਂ ਉਪਰ ਉਠਕੇ 24 ਸਾਲ ਸੇਵਾ ਕੀਤੀ। ਸੇਵਾ ਐਸੀ ਕਿ 6 ਸਾਲ ਤੱਕ guru amar das ਵਲੋਂ ਮਿਲੇ ਸਿਰਪਾਓ ਨੂੰ ਸਜਾ ਕੇ ਰੱਖਿਆ।ਬੇਪਰਵਾਹੀ ਇਤਨੀ ਕੇ ਇਕ ਵਾਰ ਸੁੱਚੇ ਮੋਤੀਆਂ ਦੀ ਮਾਲਾ ਉਸ ਮੰਗਤੇ ਨੂੰ ਦੇ ਦਿੱਤੀ ਜੋ ਗੁਰੂ ਘਰ ਸਾਮਣੇ ਬੈਠ ਉੱਚੀ ਉੱਚੀ ਰੌਲਾ ਪਾਉਂਦਾ ਸੀ ਆਪ ਜੀ ਸੋਚਿਆ ਖਬਰੇ ਮਾਲਾ ਲੈ ਚੁੱਪ ਹੀ ਕਰ ਜਾਉ।ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਤਿੰਨ ਪੁੱਤਰ ਹੋਏ। ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਸਨ ਤੇਜ ਸੁਭਾਓ ਦੇ ਮਾਲਕ ਪ੍ਰਿਥੀ ਚੰਦ ,ਵਿਚਕਾਰਲੇ ਸਨ ਮਸਤ ਸੁਭਾਓ ਮਹਾਦੇਵ ਜੀ ਤੇ ਸਭ ਤੋਂ ਛੋਟੇ ਸਨ ਨਿਮਰਤਾ ਤੇ ਪੁੰਝ guru arjan dev ji ਜੀ।

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ਲਹੌਰ ਚ ਅਕਬਰ ਨਾਲ ਮੇਲ

ਫਰਵਰੀ 1566 ਈ: ਨੂੰ ਅਕਬਰ ਆਪਣੇ ਸੌਤੇਲੇ ਭਰਾ ਮਿਰਜ਼ਾ ਹਾਕਮ ਦਾ ਪੰਜਾਬ ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਨ ਬਾਰੇ ਖਬਰ ਸੁਣਕੇ ਆਪ ਲਹੌਰ ਪੁੱਜਾ। ਅਕਬਰ ਨੂੰ ਲਹੌਰ ਪੁੱਜਾ ਸੁਣਕੇ ਮਿਰਜ਼ਾ ਹਾਕਮ ਵਾਪਸ ਮੁੜ ਗਿਆ ਪਰ ਅਕਬਰ ਆਪ ਓਥੇ 1 ਸਾਲ ਤੱਕ ਰੁਕਿਆ ਰਿਹਾ। ਅਕਬਰ ਜਦੋ ਮਾਰਚ 1566 ਈ; ਨੂੰ ਵਾਪਸ ਮੁੜਨ ਲੱਗਾ ਤਾ ਸਨਾਤਨੀ ਆਗੂ ਪੰਡਤਾਂ ਨੇ ਮਹਿਜਰ ਨਾਮਾ ਤਿਆਰ ਕਰ ਅਕਬਰ ਨੂੰ ਪਾਇਆ। ਉਸ ਚ ਲਿਖਿਆ guru amar das ਸਭ ਜਾਤਾ ਵਰਨਾ ਨੂੰ ਇਕੱਠੇ ਕਰੀ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਸੁੱਚ ਭਿੱਟ ਦੀ ਪਰਵਾਹ ਕੀਤੇ ਬਿਨਾ ਲੰਗਰ ਚਲਾ ਇਕ ਨਵਾਂ ਧਰਮ ਬਣਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਅਕਬਰ ਨੇ guru amar das ਜੀ ਨੂੰ ਇਸਤੇ ਜਵਾਬ ਦੇਣ ਲਈ ਕਿਹਾ। ਉਸ ਸਮੇ guru amar das ਜੀ ਨੇ guru ramdas ji ਨੂੰ ਯੋਗ ਜਾਣਕੇ ਸ਼ੰਕੇ ਦੂਰ ਕਰਨ ਲਈ ਭੇਜਿਆ।

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ਆਪ ਜੀ ਨੇ ਆਪਣਾ ਟਿਕਾਣਾ ਚੂਨਾ ਮੰਡੀ ਜਾ ਕੀਤਾ। ਆਪ ਜੀ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਅਦਬ ਸਤਿਕਾਰ ਨਾਲ ਲਿਜਾਇਆ ਗਿਆ। ਜਾਂਦੇ ਸਾਰ ਆਪ ਜੀ ਤੇ ਸਵਾਲਾਂ ਦੀਆ ਝੜੀਆਂ ਲਗਾ ਦਿਤੀਆਂ। ਸੁੱਚ ,ਭਿੱਟ ,ਗਾਇਤ੍ਰੀ ਮੰਤਰ ਦਾ ਜਾਪੁ ਨਾ ਕਰਨਾ ,ਲੰਗਰ ਚਲੋਣੇ ਜੋ ਜਿਸਦੇ ਮੂਹ ਆਇਆ ਬੋਲੇ। ਆਪ ਸੁਣਦੇ ਰਹੇ ਤੇ ਜਦ ਆਪ ਜੀ ਨੇ ik onkar ਮੂਲਮੰਤਰ ਤੋਂ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ਤਾ ਕਿਸੀ ਨੂੰ ਕੋਈ ਜਵਾਬ ਨਾ ਆਇਆ ਸਗੋਂ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਚੇਹਰੇ ਤੱਕਣ ਲਗੇ। ik onkar ਮੂਲਮੰਤਰ ਤੋਂ ਅਕਬਰ ਬਹੁਤ ਭਰਭਾਵਤ ਹੋਇਆ ਤੇ guru amar das ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰਨ ਦੀ ਇੱਛਾ ਜਾਹਰ ਕੀਤੀ। ਅਕਬਰ 1567 ਈ; ਦੇ ਅਰੰਭ ਚ ਦਿੱਲੀ ਨੂੰ ਮੁੜਦੇ ਸਮੇ ਗੋਇੰਦਵਾਲ ਆਇਆ।guru ramdas ji history in punjabi guru ਘਰ ਆ ਅਕਬਰ ਨੇ ਪਹਿਲਾ ਪੰਗਤ ਚ ਪਰਸ਼ਾਦਾ ਛਕਿਆ ਤੇ ਫਿਰ guru amar das ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕੀਤੇ। ਅਕਬਰ ਨੇ ਉਸ ਸਮੇ 12 ਪਿੰਡਾਂ ਦੇ ਪਟੇ ਗੁਰੂ ਘਰ ਦੇ ਨਾਮ ਲਿਖ ਦਿੱਤੇ ਤੇ ਹਰ ਸਾਲ ਵੈਸਾਖੀ ਵਾਲੇ ਦਿਨ 1 ਲੱਖ 20 ਹਜਾਰ ਸ਼ੁਕਰਾਨੇ ਵਜੋਂ ਭੇਜਦਾ ਰਿਹਾ।ਇਤਿਹਾਸ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ ਕਿ 12 ਪਿੰਡਾਂ ਦੇ ਪਟੇ ਤਾਂ ਇਕ ਆਲੇ ਚ ਹੀ ਪਏ ਰਹੇ।

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guru ramdas ji ਨੂੰ ਗੁਰਿਆਈ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ

ਦੇਖਿਆ ਜਾਵੇ ਤਾ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਦਾਵੇਦਾਰ ਸਨ ਗੁਰਿਆਈ ਦੇ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵੱਲ ਸੰਗਤ ਦਾ ਜਿਆਦਾ ਧਿਆਨ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਉਹ ਸਨ ਭਾਈ ਰਾਮਾ ਜੀ ਤੇ ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ (guru ramdas ji) guru amar das ਜੀ ਨੇ ਪਰਖ ਕਰਨੇ ਵਾਸਤੇ ਪਹਿਲਾ ਭਾਈ ਰਾਮਾ ਜੀ ਕੋਲ ਆਏ ਤੇ ਇਕ ਥੜੀ ਬਣਾਉਣ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਜਦੋ ਥੜੀ ਮੁਕੰਮਲ ਹੋ ਗਈ ਤਾ guru amar das ਜੀ ਬੋਲੇ ਇਹ ਸਹੀ ਨਹੀਂ ਬਣੀ ਇਸ ਨੂੰ ਢਾਹ ਦੀਓ। ਇਹ ਸੁਣਕੇ ਰਾਮਾ ਜੀ ਆਲੇ ਟਾਲੇ ਕਰਨ ਲੱਗੇ ਬੋਲੇ ਕਿ ਜਿਵੇਂ ਤੁਸੀ ਕਿਹਾ ਸੀ ਉਸ ਤਰਾਂ ਦੀ ਹੀ ਬਣਾਈ ਆ ,ਉਲਟਾ ਓਨਾ ਨੂੰ ਸਮਝੌਣ ਲੱਗ ਗਏ। guru amar das ਸਭ ਜਾਣੀ ਜਾਣ ਸਨ। ਫਿਰ ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ ਕੋਲ ਆਏ ਤੇ ਓਨਾ ਨੂੰ ਵੀ ਬਣਾਈ ਥੜੀ ਢਾਉਣ ਦਾ ਆਖਿਆ। ਬਿਨਾ ਦੇਰੀ ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ(guru ramdas ji) ਨੇ ਥੜੀ ਢਾਹ ਦਿੱਤੀ ਤੇ ਹੋਈ ਅਵਗਿਆ ਦੇ ਮਾਫੀ ਮੰਗੀ।
ਦੂਸਰੇ ਦਿਨ ਫਿਰ ਇਸ ਤਰਾਂ ਹੀ ਹੋਇਆ ਭਾਈ ਰਾਮਾ ਜੀ ਨੂੰ ਜਦੋ ਦੁਬਾਰਾ ਥੜੀ ਢਾਉਣ ਨੂੰ ਬੋਲੇ ਤਾਂ ਉਹ ਭੜਕ ਗਏ ਕਹਿਣ ਲੱਗੇ ਕਿ ਇਸ ਤੋਂ ਚੰਗੀ ਥੜੀ ਨਹੀਂ ਬਣਾਈ ਜਾ ਸਕਦੀ।

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ਤੋਹਾਨੂ ਪਸੰਦ ਨਹੀਂ ਆ ਰਹੀ ਬਾਕੀ ਸਭ ਨੇ ਇਸ ਦੀ ਸਿਫਤ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਜਦੋ ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ (guru ramdas ji) ਕੋਲ ਗਏ ਤਾਂ ਹਜੇ ਢਾਉਣ ਸ਼ਬਦ ਪਾਤਸ਼ਾਹ guru amar das ਦੇ ਮੁਖ ਚ ਹੀ ਸੀ ਕੇ ਆਪ ਨੇ ਥੜੀ ਢਾਉਣੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਤੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਜੀ ਕੋਲੋਂ ਮੁਆਫੀ ਮੰਗ ਕਿਹਾ ਜੀ ਆਪ ਹੀ ਕਿਰਪਾ ਕਰ ਕੇ ਦਸੋ ਮੇਰੀ ਇਨੀ ਮੱਤ ਨਹੀਂ। ਤੀਜੇ ਦਿਨ ਫਿਰ ਇਸ ਤਰਾਂ ਹੀ ਹੋਇਆ। ਭਾਈ ਰਾਮਾ ਜੀ ਨੇ ਤਾ ਇਥੋਂ ਤੱਕ ਕਿਹਾ ਕਿ ਤੁਸੀ ਹੁਣ ਬਿਰਧ ਹੋਗੇ ਓ ਤੋਹਾਨੂ ਕੁਝ ਯਾਦ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦਾ। ਇਸ ਤੋਂ ਵਧੀਆ ਥੜੀ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬਣਾ ਸਕਦਾ। ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਜਦੋ ਭਾਈ ਜੇਠਾ ਜੀ(guru ramdas ji) ਕੋਲ ਗਏ ਤਾਂ ਓਨਾ ਨੂੰ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਬਚਨ ਕਰਨ ਹੀ ਲੱਗੇ ਸਨ ਕਿ ਓਨਾ ਆਪ ਹੀ ਥੜੀ ਫਿਰ ਢਾਹ ਦਿੱਤੀ ਤੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਦੇ ਚਰਨ ਫੜ ਲਏ ਕਹਿਣ ਲੱਗੇ ਆਪ ਹੀ ਕਿਰਪਾ ਕਰੋ। ਇਨਾ ਬਚਨਾ ਨੂੰ ਸੁਨ ਕੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਪ੍ਰਸੰਨ ਹੋਏ ਤੇ ਅਸਲੀ ਗੁਰਿਆਈ ਦੇ ਹੱਕਦਾਰ ਸਮਝਿਆ।

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guru ramdas ji history in punjabi ਸਤੰਬਰ 1574 ਈ: ਦੀ ਇਕ ਸਵੇਰ guru amar das ਜੀ ਜਦੋ ਥੱਲੇ ਉਤਰ ਰਹੇ ਸੀ ਤਾ ਉਸ ਵਖਤ ਬੀਬੀ ਭਾਨੀ ਜੀ ਨੂੰ ਦੇਖ ਬੋਲੇ। ਬੇਟਾ ਅਗਰ ਰਾਮਦਾਸ ਗੁਜਰ ਜਾਏ ਤਾਂ ਕਿ ਕਰੇਗੀ।ਬੀਬੀ ਭਾਨੀ ਜੀ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸੁਹਾਗ ਦੀ ਨਿਸ਼ਾਨੀ ਉਤਾਰ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਜੀ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਚ ਰੱਖ ਦਿੱਤੀ ਤੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਭਾਣਾ ਮੰਨਣ ਦਾ ਬੋਲੇ। ਬੇਟੀ ਦਾ ਸਿਦਕ ਦੇਖ guru amar das ਪ੍ਰਸੰਨ ਹੋਏ ਤੇ ਆਪਣੀ ਉਮਰ ਚੋ 6 ਸਾਲ 11 ਮਹੀਨੇ 18 ਦਿਨ ਦੀ ਉਮਰ guru ramdas ji ਨੂੰ ਦੇ ਦਿੱਤੀ। guru amar das ਜੀ ਬਾਉਲੀ ਸਾਹਿਬ ਵੱਲ ਗਏ ਤੇ guru ramdas ji ਦੇ ਸਿਰ ਤੋਂ ਬਾਬਾ ਬੁੱਢਾ ਜੀ ਨੂੰ ਟੋਕਰੀ ਲਾਉਣ ਦੀ ਬੇਨਤੀ ਕੀਤੀ। ਸਾਫ ਬਸਤਰ ਮੰਗਵਾ ਕੇ 3 ਪੈਸੇ ਤੇ ਨਾਰੀਅਲ ਰੱਖ ਆਪ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਥਾਪਣਾ ਕੀਤੀ। ਬਾਉਲੀ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਸਾਮਣੇ ਹੀ ਦੀਵਾਨ ਲੱਗ ਗਏ। ਚਾਰੇ ਪਾਸੇ ਗੁਰਿਆਈ ਅਤੇ ਉਮਰ ਵਾਲੀ ਗੱਲ ਫੈਲ ਗਈ। ਦਾਤੂ ਦੇ ਦਾਸੂ ਜੀ ਵੀ ਆਏ। ਉਸ ਸਮੇ guru amar das ਜੀ ਦੇ ਬਚਨ ਭਾਈ ਗੁਰਦਾਸ ਜੀ ਨੇ ਰਾਮਕਲੀ ਸਦੁ ਕਰਕੇ ਆਪਣੇ ਪਾਸ ਲਿਖ ਲਏ ਜੋ ਅੱਜ ਵੀ guru granth sahib ਚ 923 ਅੰਗ ਚ ਦਰਜ ਨੇ। guru amar das ਨੇ ਮੁਖ ਤੇ ਚਾਦਰ ਲਈ ਤੇ ਦੇਖਦੇ ਹੀ ਦੇਖਦੇ ਜੋਤੀ ਜੋਤ ਸਮਾਂ ਗਏ। guru ramdas ji ਨੇ 1574 ਈ: ਤੋਂ 1581 ਈ: ਗੁਰਿਆਈ ਦੇ 7 ਸਾਲ ਦੇ ਸਮੇ ਅੰਦਰ 30 ਰਾਗਾਂ ਚ ਬਾਣੀ ਰਚੀ। ਸ਼ਬਦ 246 , ਅਸ਼ਟਪਦੀਆਂ 33 , ਛੰਤ 28 , ਜੋ ਸ਼੍ਰੀ ਗੁਰੂ guru granth sahib ji ਚ ਅੰਕਿਤ ਹੈ।

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ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਅਤੇ ਅੰਤਲਾ ਸਮਾਂ

guru amar das ਦੇ ਜੋਤੀ ਜੋਤ ਸਮਾਉਣ ਮਗਰੋਂ guru ramdas ji ਚੁੱਪ ਚੁੱਪ ਅਤੇ ਇਕਾਂਤ ਚ ਰਹਿਣ ਲੱਗੇ।guru ramdas ji history in punjabiਸੰਗਤਾਂ ਨੇ ਬਾਬਾ ਬੁੱਢਾ ਜੀ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲੈ ਕੇ guru ramdas ji ਅੱਗੇ ਚੱਲ ਰਹੀ guru ਘਰ ਦੀ ਮਰਿਆਦਾ ਨੂੰ ਜਾਰੀ ਰੱਖਣ ਲਈ ਬੇਨਤੀ ਕੀਤੀ। ਆਪ ਜੀ ਨੇ ਬੇਨਤੀ ਪ੍ਰਵਾਨ ਕੀਤੀ ਤੇ ਪਹਿਲੇ ਦੀ ਤਰਾਂ ਹੀ ਲੰਗਰ ਤੇ ਪੰਗਤ ਦੀ ਮਰਿਆਦਾ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਵਧਾਇਆ।ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਨੂੰ ਚੋਰਾਸੀ ਸਿੱਧਾ ਦੇ ਮੰਡਲੀ ਆਈ। ਕਿੰਗਰੀ ਵਾਲੇ ਜੋਗੀਆਂ ਦੀ ਮੰਡਲੀ ਆਈ। ਤਪੇ ਦਾ ਪਖੰਡ ਦੂਰ ਕੀਤਾ। ਦੂਜਾ ਗੋਇੰਦਵਾਲ ਦੀ ਵਸੋਂ ਬਹੁਤ ਸੰਘਣੀ ਹੋ ਗਈ ਤੇ ਬਿਆਸ ਦਰਿਆ ਦੇ ਕੰਢੇ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਸ਼ਾਹੀ ਫੌਜ ਦਾ ਰਸਤਾ ਵੀ ਬਣ ਗਿਆ। ਆਉਂਦੇ ਜਾਂਦਿਆ ਦੀ ਅੱਖਾਂ ਚ ਰੜਕਣ ਲੱਗ ਗਿਆ ਤਾਂ ਪੰਥ ਦੇ ਵਧਦੇ ਕੱਦ ਕਰਕੇ ਰਾਜਧਾਨੀ ਮਹਿਸੂਸ ਹੋਈ। guru amar das ਜੀ ਨੇ ਆਪ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਸਮੇ guru ramdas ji ਨੂੰ ਉਹ ਥਾਂ ਦੱਸੀ ਜਿਥੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੀ ਮੋਹੜੀ ਗੱਡਣੀ ਸੀ। 1573 ਈ: ਦੇ ਅਰੰਭ ਚ ਪਿੰਡ ਤੁੰਗ ਤੋਂ ਉਪਰਲੇ ਪਾਸੇ ਸੁਲਤਾਨ ਪਿੰਡ ਦੇ ਪੱਛਮ ਵੱਲ ਨਾਲ ਲਗਦੇ ਪਿੰਡਾਂ ਤੋਂ ਸੱਤ ਸੋ ਰੁਪਏ ਅਕਬਰੀ ਦੇਕੇ ਜਮੀਨ ਖਰੀਦੀ ਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਸ਼ਹਿਰ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਅਰੰਭ ਕਰਾਇਆ। 1577 ਈ: ਚ ਇਹ ਨਗਰ ਚੱਕ ਰਾਮਦਾਸ ਕਰਕੇ ਬਹੁਤ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੋ ਗਿਆ।

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ਜਿਥੇ guru arjan dev ji ਜੀ ਹਰ ਸਮੇ ਗੁਰੂ ਘਰ ਦੀ ਸੇਵਾ ਚ ਮਗਨ ਰਹੰਦੇ ਓਥੇ ਪ੍ਰਿਥੀ ਚੰਦ ਹਰ ਸਮੇ ਚਾਲਾਂ ਚਲਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਤੇ ਹਰ ਸਮੇ ਗੁਰੂ ਗੱਦੀ ਤੇ ਆਪਣਾ guru ramdas ji history in punjabiਹੱਕ ਜਤਾਉਂਦੇ। ਮਹਾਦੇਵ ਜੀ ਤਾ ਵੈਰਾਗੀ ਸੁਭਾਓ ਦੇ ਮਾਲਕ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਕਿਸੀ ਵੀ ਗੱਲ ਚ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੇ ਸੀ।ਭਾਈ ਸਹਾਰੀ ਮੱਲ guru ramdas ji ਦੇ ਚਾਚੇ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਵੱਡੇ ਭਰਾ ਸਨ ਤੇ ਲਹੌਰ ਚ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ। ਓਨਾ ਦੇ ਲੜਕੇ ਦੀ ਸ਼ਾਦੀ ਸੀ ਤੇ ਆਪ ਚੱਲ ਬੇਨਤੀ ਕਰਨ ਆਇਆ। guru ramdas ji ਨੇ ਪਹਿਲਾ ਪ੍ਰਿਥੀ ਚੰਦ ਨੂੰ ਸ਼ਾਦੀ ਚ ਜਾਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਓਨਾ ਅੱਗੋਂ ਮਾਇਆ ਦੀ ਸਾਂਭ ਸੰਭਾਲ ਦਾ ਬਹਾਨਾ ਲਗਾ ਨਾਂਹ ਕਰ ਦਿੱਤੀ। ਮਹਾਦੇਵ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਤਾ ਓਨਾ ਨੇ ਅਗੋਂ ਉਪਦੇਸ਼ ਦੇਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਪਰ ਜਦੋ guru arjan dev ji ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਤਾ ਓਨਾ ਆਪ ਜੀ ਦਾ ਹੁਕਮ ਸਿਰ ਮੱਥੇ ਕਿਹਾ। ਸ਼ਾਦੀ ਮੁਕੰਮਲ ਹੋ ਚੁਕੀ। guru arjan dev ji ਜੀ ਬਾਕੀ ਸਮਾਂ ਸੰਗਤ ਨੂੰ ਗੁਰਬਾਣੀ ਨਾਲ ਜੋੜਦੇ।

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ਜਿਵੇਂ ਜਿਵੇਂ ਸਮਾਂ ਬੀਤਦਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਤਿਵੇਂ ਤਿਵੇਂ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਦਰ੍ਸ਼ਨ ਦੀ ਪਿਆਸ ਵਧਦੀ ਜਾ ਰਹੀ ਸੀ। guru arjan dev ji ਜੀ ਨੇ 3 ਚਿਠੀਆਂ ਭੇਜੀਆਂ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਚੋ ਦੋ guru ramdas ji ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਮਿਲੀਆਂ। ਪ੍ਰਿਥੀ ਚੰਦ ਨੇ ਧੋਖੇ ਨਾਲ ਹੀ ਓਨਾ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲ ਲਿਆ। ਓਨਾ ਦਾ ਜਵਾਬ ਵੀ ਕੋਲੋਂ ਹੀ ਦਿੰਦਾ ਰਿਹਾ।ਜਦੋ ਤੀਸਰੀ ਚਿਠੀ guru ramdas ji ਨੂੰ ਮਿਲੀ ਤਾ ਸਾਰੀ ਸਚਾਈ ਦਾ ਪਤਾ ਲੱਗਾ। ਉਸ ਸਮੇ ਫਿਰ guru ramdas ji ਨੇ ਬਾਬਾ ਬੁੱਢਾ ਜੀ ਆਖ guru arjan dev ji ਨੂੰ ਬੁਲਾਇਆ। 28 ਅਗੱਸਤ 1581 ਈ: ਨੂੰ guru arjan dev ji ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਗੱਦੀ ਦੇ ਕੇ ਗੁਰਬਾਣੀ ਦਾ ਪਸਾਰ ਕਰਨ ਦਾ ਉਪਦੇਸ਼ ਦਿੱਤਾ। 1 ਸਤੰਬਰ 1581 ਈ: ਨੂੰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਵੇਲੇ ਹਰ ਰੋਜ ਦੀ ਤਰਾਂ ਨਿਤਨੇਮ ਕਰ ਸੰਗਤ ਤੋਂ ਆਗਿਆ ਮੰਗੀ। 6 ਸਾਲ 11 ਮਹੀਨੇ 18 ਦਿਨ ਦੀ ਉਮਰ ਪੂਰੀ ਕਰ ਜੋਤੀ ਜੋਤ ਸਮਾ ਗਏ।

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